महिलाओं की मजबूती के खुले कई रास्ते - Hindustan
महिलाओं की मजबूती के खुले कई रास्ते Hindustan
First reported 2 weeks ago · latest update 6 days agoसाल 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी ने कुछ धार्मिक रस्में निभाई थीं, जैसा कि कोई भी आस्थावान भारतीय करता है। उस समय पवित्र कलश को ले जाने के लिए किसी पुरोहित या महात्मा को चुनना सबसे स्वाभाविक विकल्प होता, लेकिन परंपरा से हटकर मोदी जी ने रवीना जाधव को चुना, जो एक दलित लड़की थी और झुग्गी बस्ती में रहती थी। यह कोई बहुत प्रचलित या दिखावे के लिहाज से किया गया काम नहीं था, बल्कि सही काम था।
नरेंद्र मोदी के लिए महिलाओं की गरिमा और सम्मान, उन्हें सशक्त बनाने की पहली सीढ़ी रही है। महिला सशक्तीकरण उनके लिए कोई दान या एहसान नहीं है। इसका मतलब है, किसी महिला को यह विश्वास दिलाना कि उसे अपनी जिंदगी और अपना भविष्य खुद तय करने का पूरा अधिकार है। इसका मतलब देश-समाज में ऐसा माहौल बनाना है, जहां आत्मविश्वास से भरपूर एक लड़की जागरूक नागरिक बनकर आगे बढ़ सके। मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी ने गुजरात में कन्या केलवणी योजना शुरू की थी, जिसका उद्देश्य लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देना था। वह खुद गांवों में जाते थे और माता-पिता से अपनी बेटियों को स्कूल भेजने की अपील करते थे। समय के साथ अलग-अलग रूप में कई राज्यों, यहां तक कि विरोधी पार्टियों की सरकारों ने भी इस योजना को अपनाया, उनमें थोड़े बदलाव किए और नए नाम दिए। कच्छ में भूकंप के बाद जब पुनर्निर्माण किया गया, तब मोदी ने यह सुनिश्चित किया कि नए बने घर पति और पत्नी, दोनों के नाम पर दर्ज हों।
साल 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद उनके ‘विजन’ का असली विस्तार सामने आया। उन्होंने महिलाओं के लिए योजनाएं ही शुरू नहीं कीं, बल्कि देश के आर्थिक बदलाव के केंद्र में उन्हें रखा। जरा इन आंकड़ों पर गौर कीजिए, क्योंकि ये बहुत महत्वपूर्ण हैं। प्रधानमंत्री जन-धन योजना के तहत पहली बार देश में करोड़ों महिलाओं के बैंक खाते खुले। आज जन-धन खातों में 56 प्रतिशत खाते महिलाओं के हैं। इसी तरह, मुद्रा योजना के लाभार्थियों में 68 प्रतिशत महिलाएं हैं। इस योजना के तहत लाखों स्त्रियों को बिना किसी गारंटी के कर्ज मिला, जबकि पहले महिलाओं को बैंक के दरवाजे से ही वापस लौटा दिया जाता था।
एक महिला के लिए अपने नाम से बैंक खाता होना और जरूरत पड़ने पर कर्ज की सुविधा होना बहुत बड़ी ताकत है। बिना किसी से अनुमति लिए अपने आर्थिक फैसले खुद करने की क्षमता, आजादी का एक नया रूप है। मैंने इस बदलाव को 8 मार्च, 2018 को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर खुद महसूस किया था। उस दिन प्रधानमंत्री राजस्थान के झुंझुनू आए थे। वहीं से उन्होंने ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान’ और देश के प्रमुख पोषण अभियान की भी शुरुआत की। उस कार्यक्रम में मौजूद एक लाख से भी अधिक लोगों की भीड़ में लगभग आधी महिलाएं थीं।
आज नवजात लड़कियों का लिंग अनुपात साल 2014-15 के 918 से बढ़कर 929 हो गया है। वहीं, माध्यमिक स्तर पर लड़कियों का सकल नामांकन अनुपात 75.51 प्रतिशत से बढ़कर 83.4 प्रतिशत हो गया है। अब बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का ध्यान लड़कियों की स्टेम क्षेत्रों, यानी विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग व गणित में भागीदारी बढ़ाने और उन क्षेत्रों में व्यावसायिक प्रशिक्षण देने पर भी है, जिनमें परंपरागत रूप से पुरुषों का वर्चस्व रहा है। इससे भी आगे बढ़कर उन्होंने एक ऐसी कल्पना को साकार किया, जिसके बारे में बहुत कम लोगों ने सोचा था- ‘नमो ड्रोन दीदी योजना’। इसके तहत देश के 15,000 महिला स्वयं सहायता समूहों को कृषि ड्रोन दिए गए और गांव की महिलाओं को ड्रोन पायलट और उद्यमी बनाया जा रहा है। बैंक खाते से लेकर ड्रोन तक सिर्फ एक दशक में भारतीय महिलाओं ने काफी लंबी यात्रा तय की है।
प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में महिलाओं को सशस्त्र सेनाओं में स्थायी कमीशन मिला। उन्हें राष्ट्रीय रक्षा अकादमी में प्रवेश मिला और युद्धक भूमिकाओं में भी शामिल किया गया। फाइटर जेट के कॉकपिट से लेकर लोकसभा तक, जो दरवाजे दशकों से बंद थे, अब खुल चुके हैं। उनके नेतृत्व में ही नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित हुआ, जिसमें लोकसभा व राज्य विधानसभाओं की एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान किया गया। यह एक ऐसा कदम है, जिसकी प्रतीक्षा यह गणराज्य आजादी के बाद से ही कर रहा था।
तथ्यों और जबरन बनाए गए राजनीतिक नैरेटिव के बीच का अंतर नजरअंदाज करना मुश्किल है। कुछ नेता माइक्रोफोन के पीछे खड़े होकर पितृ-सत्ता को खत्म करने की बातें लगातार करते हैं, पर उन्हीं की पार्टी की सरकारों में ऐसे मंत्रिमंडल होते थे, जिनमें एक भी महिला नहीं होती थी। विपक्ष के नेता राहुल गांधी महिलाओं के अधिकारों पर भाषण देते हैं, जबकि उनकी अपनी पार्टी की सरकारों में फैसले लेने वाली जगहों पर महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने में मुश्किलें आती रहती हैं।
भारत जैसे देश में प्रतीकों का बहुत महत्व है, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के लिए प्रतीकवाद हमेशा वास्तविक उद्देश्य और काम से जुड़ा रहा है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस, 2020 पर उन्होंने एक ऐसा कदम उठाया, जो पहले कभी नहीं हुआ था। उन्होंने अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स कुछ समय के लिए सात ऐसी महिलाओं को सौंप दिए, जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में असाधारण काम किया था। आज माध्यमिक स्कूलों में पढ़ाई छोड़ने वाली लड़कियों की दर घटकर महज सात प्रतिशत रह गई है और वे लड़कों की तुलना में कम संख्या में स्कूल छोड़ती हैं। इसी तरह, प्रधानमंत्री आवास योजना-शहरी 2.0 के तहत स्वीकृत घरों में 97 प्रतिशत घर पूरी तरह या संयुक्त रूप से महिलाओं के नाम हैं। ये बदलाव यूं ही नहीं हुए हैं। ये उन पौधों के फल हैं, जिनको वर्षों पहले लगाया गया, लगातार सींचा और संभाला गया है। देश प्रधानमंत्री मोदी को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जानता है, जिन्होंने दशकों पहले स्त्री शक्ति पर तब विश्वास किया, जब बहुत से लोग इसके बारे में सोचते भी न थे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्पष्ट विश्वास है कि भारत तब तक वह राष्ट्र नहीं बन सकता, जैसा वह बनना चाहता है, जब तक कि उसकी महिलाओं को अपनी पूरी क्षमता हासिल करने के लिए अवसर, सम्मान और स्वतंत्रता नहीं दी जाती।
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