Political reactions to BBC investigation on donations to 'paper' political parties
Following a BBC investigation into donations received by 'paper' political parties, various political leaders have demanded an official inquiry. Rajya Sabha MP Sanjay Singh has publicly questioned the role of the Election Commission regarding this matter.
First reported 1 week ago · latest update 5 days ago
राजनीति में गुमनाम पार्टियों को मिलने वाले भारी भरकम चंदे को लेकर बीबीसी की एक इनवेस्टिगेशन स्टोरी पर कई पार्टियों ने प्रतिक्रिया दी है.
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने पूछा है कि क्या इस मामले में वित्त मंत्रालय और अन्य एजेंसियां जांच करेंगी.
जबकि आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने शनिवार को एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर आरोप लगाया कि 'यह चंदा इन पार्टियों के ज़रिए बीजेपी को मिला है.'
बीबीसी के एक इनवेस्टिगेशन रिपोर्ट में भारत की कई ऐसी राजनीतिक पार्टियों के बारे में पाया गया कि चुनावी राजनीति से लगभग ग़ायब रहने के बावजूद उन्हें सैकड़ों करोड़ रुपये का चंदा मिला.
बीबीसी की रिपोर्ट सामने आने के बाद कई विपक्षी दलों और नेताओं ने इन राजनीतिक दलों को मिले चंदे पर सवाल उठाए हैं.
कुछ वरिष्ठ पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों ने भी रिपोर्ट का हवाला देते हुए इन पार्टियों की भूमिका पर सवाल खड़े किए हैं.
संजय सिंह ने यूपी के लखनऊ में एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस के दौरान कहा, "जिन दलों को ये मोटा चंदा मिला है, उनके दफ़्तर गुजरात में हैं. मैं सीधे तौर पर आरोप लगा रहा हूं कि ये चंदा 'चंदा चोर पार्टी' बीजेपी को मिला है."
"टीएमसी के सांसद साकेत गोखले को ईडी ने 500 रुपये के मामले में जेल में डाल दिया गया था, मुझे और हमारी पार्टी के नेताओं को जेल में डाल दिया था, लेकिन इतना बड़ा भ्रष्टाचार हुआ, फिर भी एक आदमी को जेल नहीं हुई. न कोई ईडी की जांच हुई और न ही सीबीआई की."
उन्होंने इस मामले में चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठाया.
संजय सिंह ने कहा, "इस मामले में चुनाव आयोग ने कोई क़दम नहीं उठाया. चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार कुंभकर्ण की नींद सो रहे हैं. बीबीसी ने उनसे संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन चुनाव आयोग ने कोई जवाब नहीं दिया."
आम आदमी पार्टी ने इसे 'बीजेपी के चंदे का खेल' बताया.
आप ने आधिकारिक एक्स हैंडल पर लिखा, "बीजेपी के चंदे का नया खेल एक्सपोज़्ड! गुजरात की 6 छोटी, ग़ैर-मान्यता प्राप्त पार्टियों को 1,700 करोड़ रुपये का चंदा, जबकि बीजेपी को छोड़ बाकी नेशनल पार्टीज़ को कुल 1,480 करोड़ रुपये!"
आप ने लिखा, "बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक़, इनकम टैक्स ने इन पार्टियों की जांच तक नहीं की. क्या बीजेपी के ज़रिए कालेधन को सफ़ेद करने का खेल चल रहा है?"
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कांग्रेस सेवा दल ने कहा है कि अगर इन दलों का तार सत्ता में बैठे लोगों से जुड़ते हैं, तो यह सिर्फ़ चंदे का मामला नहीं, लोकतंत्र के साथ बड़ा खेल है.
कांग्रेस सेवा दल ने एक्स पर लिखा, "गुजरात का नया राजनीतिक चंदा-खेल? छोटी-छोटी पार्टियां, हज़ारों करोड़ का चंदा, वोट सैकड़ों भी नहीं, और फिर दफ़्तर बंद, फ़ोन बंद! 620 करोड़ रुपये का चंदा पाने वाली 'आम जनमत पार्टी', जिसका दफ़्तर बंद, अध्यक्ष ग़ायब और कोषाध्यक्ष कहता है उसे कुछ पता नहीं!"
"दूसरी ओर, मुख्य विपक्षी राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस को सिर्फ़ 125 रुपये करोड़ मिले. उसी दौरान कांग्रेस के खाते में प्रूडेंट इलेक्टोरल ट्रस्ट से 156.4 करोड़ रुपये आए, जो राष्ट्रीय पार्टियों को मिलता है."
"अगर इन पार्टियों के तार सत्ता के क़रीब बैठे लोगों से जुड़ते हैं, तो यह सिर्फ़ चंदे का मामला नहीं, लोकतंत्र के साथ बड़ा खेल है."
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने भी इस मामले पर प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने तंज कसते हुए एक्स पर लिखा, 'मोदी है तो सब मुमकिन है.'
उन्होंने लिखा, "वर्ष 23-24 में आम जनमत पार्टी के पास कांग्रेस से भी चंदा आया. क्या चुनाव आयोग इस पार्टी के बैंक अकाउंट की छानबीन करेगा? क्या वित्त मंत्रालय इसकी ईडी आईटी विभाग से जांच कराएंगे?"
"ये पार्टी अब बिहार से गुजरात चली गई. लेकिन 620 करोड़ रुपये बैंक अकाउंट में होने वाली पार्टी अब कहां है? उसका अकाउंट अभी भी चालू है. चंदा अभी भी स्वीकार हो रहा है! मोदी है तो सब मुमकिन है."
झारखंड मुक्ति मोर्चा ने एक्स पोस्ट के ज़रिए इस मामले पर सवाल उठाए. पार्टी ने पूछा कि इन दलों को इतना पैसा आख़िर किसने दिया.
झारखंड मुक्ति मोर्चा ने एक्स पोस्ट में लिखा, "भाजपा का गुजरात मॉडल... यह सरेआम लोकतंत्र का चीरहरण नहीं है तो और क्या है? गुजरात में ये कौन सी पार्टियां हैं जिन्हें हज़ारों करोड़ रुपए चंदा मिला और वोट न के बराबर. इतने हज़ार करोड़ का चंदा आख़िर किसने दिया? किसके इशारे पर दिया गया? और क्यों दिया गया?"
समाजवादी पार्टी के बदायूं से सांसद आदित्य यादव ने एक्स पर लिखा, "एक राजनीतिक पार्टी को एक ही वित्तीय वर्ष में कथित तौर पर 620 करोड़ रुपये का चंदा मिल जाए और फिर भी इस पर कोई ठोस सवाल न उठे तो सवाल सिर्फ़ चंदे का नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की पारदर्शिता का है."
उन्होंने पूछा , "इतना पैसा आया कहां से? किसने दिया? किस मक़सद से दिया? कहां खर्च हुआ? पार्टी का पता और ढांचा क्यों बदला? और सबसे बड़ा सवाल-क्या राजनीतिक दलों के नाम पर काले धन या चंदे की हेराफेरी का कोई रास्ता बनाया जा रहा है?"
"अगर सब कुछ नियमों के मुताबिक़ है, तो निष्पक्ष जांच से परेशानी क्यों? आख़िर जांच एजेंसियों की जवाबदेही सिर्फ़ विपक्ष तक ही क्यों सीमित होनी चाहिए?"
तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की राज्यसभा सांसद सागरिका घोष ने भी कई सवाल किए हैं.
उन्होंने एक्स पर लिखा, "बीबीसी हिंदी की भारत की रहस्यमयी 'काग़ज़ी पार्टियों' पर बड़ी खोज- ऐसे राजनीतिक दल जिनके पास न कोई दफ़्तर है, न कार्यकर्ता, न उम्मीदवार और न ही वोट देने वाले लोगों का आधार, फिर भी उन्हें करोड़ों-अरबों रुपये का भारी चंदा मिल रहा है."
उन्होंने लिखा, "क्या इन पार्टियों का इस्तेमाल टैक्स बचाने और पैसों को ग़लत तरीक़े से इधर-उधर करने के लिए किया जा रहा है? चंदा देने वाले कौन हैं? आख़िर पैसा कहां गया? चुनाव आयोग और आयकर विभाग ने कार्रवाई क्यों नहीं की? हम पहले से ही उस अजीब एनसीपीआई के बारे में जानते हैं, जहां इस समय 20 गद्दार सांसद हैं."
दरअसल, बीबीसी की यह पड़ताल जून में उसी समय शुरू हुई जब तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसद पार्टी छोड़कर नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में शामिल हो गए थे.
एनसीपीआई भी एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी (आरयूपीपी) है.
इस पर टीएमसी के 20 बागी सांसदों के इसमें विलय और एनडीए को समर्थन देने के बाद बड़े सवाल उठे थे.
बीबीसी ने उन छह पार्टियों की पड़ताल की है जिन्हें 2024 के आम चुनाव से पहले सबसे अधिक चंदा मिला है, हालांकि, इस सूची में एनसीपीआई शामिल नहीं है.
बीबीसी की ओर से की गई इस पड़ताल पर पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों के भी कमेंट्स हैं.
वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने पूछा कि क्या चुनाव आयोग और ईडी इस मामले की जांच करेंगे?
उन्होंने एक्स पर लिखा, "क्या चुनाव आयोग यह जांच करेगा कि इन छोटी और अनजान पार्टियों में बड़ी रकम कौन डाल रहा है? इस मामले में ये गुजरात की हैं, लेकिन ऐसी पार्टियां पूरे भारत में हैं. क्या ईडी यह जांच करेगा कि यह पैसों को ग़लत तरीक़े से इधर-उधर करने का एक और बड़ा मामला है? या कुछ मुद्दों को छूना ही नहीं है?"
वरिष्ठ लेखक और कांग्रेस के पूर्व प्रवक्ता संजय झा ने कहा कि इस मामले की बारीकी से जांच होनी चाहिए. साथ ही सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में स्पेशल इन्वेस्टिगशन टीम (एसआईटी) की उन्होंने मांग की है.
संजय झा ने एक्स पर लिखा, "बीबीसी की यह रिपोर्ट चौंकाने वाली है. इन राजनीतिक पार्टियों को पैसा किसने दिया क्या ये किसी के लिए सामने से काम करने वाली पार्टियां थीं? और अगर ऐसा है, तो किसके लिए?"
"इस मामले की बारीक़ी से जांच होनी चाहिए और तय समय में जांच पूरी होनी चाहिए. इसके लिए सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में एसआईटी बनाई जानी चाहिए."
उन्होंने कहा, "मैं हमेशा से मानता रहा हूं कि चुनाव में मिलने वाले पैसे के मामले में पारदर्शिता को बहुत लंबे समय से नज़रअंदाज किया गया है. चुनावी बॉन्ड इसका एक सही उदाहरण है कि व्यवस्था में कितनी गड़बड़ी है."
वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने पूछा कि क्या यह पैसा वोट ख़रीदने के लिए बांटा गया है.
उन्होंने एक्स पर लिखा, "भारत की चुनावी प्रक्रिया सड़ गई है. इसमें इतने स्तर पर घोटाले के दरवाज़े खोल दिए गए हैं कि पता नहीं चलता जो रिज़ल्ट हम देखते हैं वो आयोग का है या प्रिंटर से निकला है."
"छह पार्टी के पास सैंकड़ों करोड़ का चंदा कहां से आया? क्या इसकी जांच में भी बरसों लगेंगे? इस पैसे के ख़र्च किए जाने का हिसाब तो होगा. क्या ये पैसा वोट ख़रीदने के लिए बांटा गया है?"
इस मामले में कांग्रेस सांसद और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी का एक पुराना एक्स पोस्ट भी फिर से वायरल हो रहा है.
राहुल गांधी ने एक अख़बार में छपी ख़बर को साझा करते हुए 27 अगस्त, 2025 को लिखा था कि गुजरात में कुछ ऐसी अनाम पार्टियां हैं, जिन्हें 4300 करोड़ का चंदा मिला है.
राहुल गांधी ने एक्स पर एक्स पर लिखा था, "गुजरात में कुछ ऐसी अनाम पार्टियां हैं जिनका नाम किसी ने नहीं सुना- लेकिन 4300 करोड़ का चंदा मिला! इन पार्टियों ने बहुत ही कम मौक़ों पर चुनाव लड़ा है, या उनपर खर्च किया है."
"ये हज़ारों करोड़ आए कहां से? चला कौन रहा है इन्हें? और पैसा गया कहां? क्या चुनाव आयोग जांच करेगा - या फिर यहां भी पहले एफ़िडेविट मांगेगा? या फिर क़ानून ही बदल देगा, ताकि ये डेटा भी छिपाया जा सके?"
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